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Monday, 10 December 2018

देवप्रयाग, उत्तराखंड- Devprayag, Uttrakhand

29 सितम्बर 2017, दिन- शनिवार 


सितम्बर माह में लगातार तीन दिन की छुट्टियों  का योग बना। 30 सितम्बर का दशहरा, 1 अक्टूबर का रविवार और 2 को गांधी जयंती। लगातार तीन छुट्टियों को योग कोई घुमक्कड़ छोड़ दे.... यम्पॉसिबल।। हां बिलकुल ठीक मैंने भी इन छुट्टियों में घूमने की योजना पहले ही बना रखी थी। इस बार मन में था कि ट्रेकिंग की जाए। इसलिए हर की दून जाने पर विचार करने लगा। अपने घुमक्कड़ों के व्हाट्सअप ग्रुप में जब इस बारे में बात की तो वहा जाने का इच्छुक तो कोई नहीं मिला पर अम्बाला के रहने नरेश सहगल जी ने मुझे अपने साथ रुद्रनाथ ट्रेक पर चलने का ऑफर दिया। रुद्रनाथ ट्रेक भी बहुत मनभावन है। और यदि इस ट्रेक के लिए गया तो सहगल जी का साथ भी मिलता। इन बातों से मेरा मन हर की दून से छलांग लगा सीधा रुद्रनाथ पर पहुंच गया। हम दोनों ने जाने की तारीख, मिलने का स्थान लगभग सभी बुनियादी बातें पहले ही तय कर ली थी। अब हम कहाँ जायेगे, कैसे जायेगे इस पर मैंने कोई जानकारी ग्रहण नहीं की। इन सबकी जिम्मेदारी सहगल जी पहले ही ले चुके थे।
तो सोचा अपनी हर यात्रा का ढांचा मैं खुद ही तैयार करता हूँ। इसमें एक फायदा भी है और एक नुकसान भी। फायदा है कि सब कुछ अपनी मर्जी के मुताबिक होता है और नुकसान यह है कि आपको कहाँ जाना है, कैसे जाना है, कहाँ ठहरना है इत्यादि सभी की सर दर्दी खुद की हो जाती है। कहते है यात्रा का अलग-अलग ढंग से स्वाद चखना चाहिए। तो इसी को याद रखते हुए इस बार का कब, क्यों, कैसे का भार सहगल जी के कंधो पर छोड़ दिया और उनसे इस विषय पर ज्यादा सवाल नहीं किये। वो भी एक अच्छे घुमक्कड़ है और अपना ब्लॉग भी लिखते है इसलिए मुझे पूरा विश्वास था कि वे जो भी योजना बनायेगे वो अच्छी ही होगी। तो सहगल जी अपनी कार से आएंगे और हमें ऋषिकेश में मिलेंगे। और मैं ठहरा बाइक मैन। 

मेरे साथ मेरी मौसी जी का लड़का 'सागर' बहुत दिनों से मेरे साथ कही चलने को बोल रहा था। वैसे हमें अक्सर अपने करीबी रिश्ते ही याद आते है जैसे ताऊ, चाचा, मामा, मौसी, बुआ... हम कभी ये नहीं कहते की ताईजी का बेटा, मामी का बेटा, फूफा जी का बेटा ...यह बहुत बड़ी और लाइलाज बीमारी है ...। हां तो छोटा भाई जिसका नाम सागर है, वो चलने को कह रहा था तो मैंने इस यात्रा में उसको साथ चलने की बोल दिया। समय से ही सारी तैयारी कर ली गयी। मेरा मन था कि हम शुक्रवार को रात को घर से निकलेंगे और ऋषिकेश सुबह-सुबह पहुंच जायेगे और जब तक सहगल जी वहा नहीं आ जाते तब तक, वही गंगा किनारे आराम फरमाएंगे। शुक्रवार की रात को सारा सामान ले, मैं मुरादनगर चला गया, जहाँ से मुझे सागर को साथ लेना था। पर केवल मैं ही अकेला नहीं था जो इन तीन दिन की छुट्टियों में कही जा रहा था। मेरे जैसे और भी प्रेमी थे। नतीजन भारी जाम का सामना गाजियाबाद में ही हो गया। और मुरादनगर, मैं रात 10 बजे पहुंचा। सागर इस समय भी चलने को तैयार था पर मैं नहीं। जब कभी हम अपने किसी छोटो को साथ लेकर चलते है तो उसकी सारी जिम्मेदारी हमारी खुद की होती है। इसलिए सुरक्षा का पैमाना तनिक बढ़ाना पड़ता है। ज्यादा रात को बाइक पर चलना सेफ नहीं है, अब हम सुबह 4 बजे चलेंगे। यह कह, मैं सो गया। 

सुबह 3:30 बजे के अलार्म ने नींद की डोरी काटी। रजनीकांत स्टाइल में फाटक से तैयार हो, 4 बजे वहा से निकल लिए। उजाला होने तक हम दोनों मेरठ बाईपास से होते हुए रुड़की पहुंच गए। सुबह का समय था इसलिए कही जाम नहीं मिला। कुछ ही घंटों में हरिद्वार पहुंच गए। इसी बीच एक कॉल आयी पर बाइक पर पता नहीं चला। जब आराम करने के लिए बाइक रोकी तब मोबाइल देखा। संजय कौशिक जी की कॉल थी। फौरन उनसे बात की तो पता चला वो भी अपने परिवार संग उत्तराखंड ही आये हुए है। लेकिन हमारे रास्ते अलग-अलग होने की वजह से हम मिल नहीं पाए पर यात्रा की शुभकामनाएं जरूर दी। संजय जी से बात करने के बाद हम फिर से बाइक पर सवार हो ऋषिकेश को हो लिए। ऋषिकेश पहुंच सहगल जी से बात हुई तो पता चला उन्हें अभी यहाँ आने में काफी समय लगेगा। आगे रास्ते में मिलने की बात सहगल जी ने कही, जिस पर सहमति जता हम दोनों ऋषिकेश में बिना रुके, आगे चलने लगे। ऋषिकेश से देवप्रयाग होते हुए हमे रुद्रप्रयाग की ओर जाना था। समय सुबह 9 का हो गया था और भूख भी लग रही थी। ऋषिकेश को पार करते ही एक चाय की दुकान पर बाइक को अस्थायी रूप से आजाद किया। इस दुकान के पीछे से गंगा और ऋषिकेश का रूप अनोखा लग रहा था। यही बैठ मैगी और चाय का स्वाद लिया। तकरीबन आधा घंटा यहाँ रुक, हम फिर से चल दिए। इस रास्ते पर मैं पहली दफा आया था। गंगा के विपरीत चल रहे थे लेकिन साथ-साथ भी। पीछे से राफ्टिंग कराने के लिए जीप लोगों को भर-भर ला रही थी। 

बीच में एक दो जगह रूक हम कुछ फोटो भी लेते रहे। शिवपुरी, ब्यासी होते हुए, हम दोपहर तक देवप्रयाग पहुंच गए। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी नदी का मन मोह देने वाला खूबसूरत संगम है। ऊपर से देखने पर दोनों नदी के रंग में फर्क आसानी से दिखाई देता है। संगम के कुछ फोटो ऊपर से लिए। दरअसल जहाँ इन दोनों नदियों का संगम होता है वही नहाने के लिए स्थायी जगह बनायीं गयी है। मेरा भी मन वहां नीचे जाने का हो रहा था। नीचे जाने से पहले सहगल जी से फिर से फ़ोन पर बात हुई तो पता चला ऋषिकेश में बहुत भयंकर जाम लगा हुआ है। और वे अपने मित्रों के संग अभी उसी जाम का हिस्सा बने हुए थे। आज ज्यादा सफर पूरा करने की योजना थी। पर अब तकरीबन 4 घंटे रह गए थे, अँधेरा होने में। इसलिए आगे जाने का विचार त्याग, रुद्रप्रयाग पहुंचने पर हामी हुई। परिस्थिति साफ़ होने के बाद हम देवप्रयाग में नीचे जाने के लिए दायी ओर नीचे की तरफ हो लिए। यह 5-6 फ़ीट चौड़ा पक्का रास्ता, घरों के बीच में से होकर जा रहा है। कुछ ही क्षण में हम पहुंच गए। यहाँ गिनती के 2-3 लोग ही थे। शांति ने पूरी तरह अपना साम्राज्य स्थापित किये हुए था। मन को ऐसी ख़ामोशी शायद पहले कब मिली ? इसका जवाब दिए बिना ही मेरा मस्तिष्क एकांत की इस मखमली चादर पर बिखरने को बेताब था। ऐसा लग रहा था मनो वो मुझ हि से कह रहा हो कि क्यों मैं तुम्हारी हर सवाल का जवाब दू , क्यों मैं हमेशा तुम्हारी ही सुनु , क्यों मैं हमेशा तुम्हारे लिए ही काम करू, क्यों ..... । सुनो, अब मैं तुम्हारी सुनने वाला नहीं। .... मेरी मंजिल तो यही है। 

दूसरी ओर दोनों नदियों का पानी अपने संगम का जश्न पूरे जोश से मना रही थी। उन दोनों की एक-दूसरे से मिलने की ख़ुशी एक मधुर संगीत की भाति प्रतीत हो रहा थी। हम बहुत समय तक यूं ही पानी में पैर डाले हुए बैठे रहे। अच्छा..... नहीं नहीं बहुत अच्छा लगा। यहां से जाने का बिल्कुल भी मन नहीं था। पर समय की यही मांग थी। ये समय मांगता बहुत है....।सो, 1 घंटा सवारने के बाद, हम आगे की यात्रा के लिए चल दिए। हमें अब रुद्रप्रयाग ही रुकना है जो देवप्रयाग से लगभग 68 किलोमीटर है। और अँधेरा होने में भी 3 घंटे का समय बाकी रह गया। हम होले-होले चलते रहे।वैसे अधिकतर पहाड़ो पर सड़क घुमावदार ही रहती है। पर यहाँ से दृश्य देख दिल गद-गद हो गया। आगे का नज़ारा देख दिल चहक उठा। आगे की घाटी बहुत ही चौड़ी थी और उस पर रोड़ बिल्कुल सीधी। अब बाइक भी 60-70 की स्पीड पर आराम से चल रही थी और बराबर में बहती नदी कही-कही ऐसी लग रही थी जैसे कोई द्वीप। शाम 7 बजे हम आज की यात्रा के अंतिम छोर पर पहुंच गए। अब फिर एक बार सहगल जी से बात की तो पता चला कि वे सब देवप्रयाग पहुंच गए है। अब उनके आने में ज्यादा समय नहीं रहा क्योंकि आगे की घाटी बहुत ही चौड़ी है और रास्ते सीधे....। खैर उनके आने से पहले मैंने होटल में हम सभी के लिए कमरे की व्यवस्था कर ली। 1 घण्टे बाद, वे सब भी पहुंच गए। मिलना-मिलाना हुआ.... रात तो हो चुकी थी और हमारे हिसाब से मौसम भी थोड़ा सर्द था। इसलिए जल्द ही खाना खाकर सभी सो गए। (समय के अभाव के कारण, यह यात्रा एक साल बाद लिख रहा हूँ। इस देरी के लिए आप सभी से माफ़ी।) 





सागर 



ऋषिकेश 



शिवपुरी के पास 



राफ्टिंग करते हुए 



मिलन  



देवप्रयाग 


देवप्रयाग 



अनेको रूप - देवप्रयाग 



यही ऊपर से दोनों नदियों का अद्भुत संगम देखा जाता है। 



यहां पानी की गति बहुत ही तेज है। 




तिहरा शतक- जिला गाजियाबाद 



पहाड़ों को दो भागों में बाटता रास्ता 



यही संगम के पास बैठ आराम किया 



संगम नज़दीक से 


मैं मुसाफ़िर 


बलखाती-लहराती 



टापू 


इस बाइक ने भी बहुत यात्रा में मेरा साथ दिया। 


यहाँ आकर घाटी काफी चौड़ी हो जाती है और रास्ते कम घुमावदार होते है। 



बरसात के बाद अक्टूबर में यौवन 



प्रकृति की खूबसूरती बेमिसाल है। 



प्रकृति प्रेमी के लिए 




ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाए  



वेलकम टू रुद्रप्रयाग 


 इस यात्रा के सभी भाग आप यहाँ से पढ़ सकते है (अगला भाग जल्द ही...)










































1 comment:

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