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Monday, 8 May 2017

यात्रा का दूसरा पहलू : शिमला - Yatra Ka Dusra Pahalu : Shimla

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दिनांक- 11 मार्च 2017, दिन- शनिवार 

वही हमेशा की तरह सुबह 6 बजे आँख खुल गयी। मैं अपनी इस आदत से बहुत परेशान हूँ। अपने घर पर तो मैं 8 बजे तक भी सो लेता हूँ। पर किसी रिश्तेदारी में या अनजान जगह पर चाहे मुझे रात को कितनी भी देरी से नींद आयें, लेकिन सुबह जल्दी आँख खुल जाती है। चाह कर भी मैं ज्यादा देर तक नहीं सो पाता।  इस पर मुझे अभी काम करने की जरूरत है। खैर तैयार हो 8:30 तक हमने होटल पेर्स्टीज को अलविदा बोल दिया। 


बाहर मॉल रोड़ पर आयें तो अभी दुकानें बंद थी। आसमान में बादलों ने अपने विशालकाय पंख फैला रखे थे जिससे वातावरण में ठंड बनी हुई थी। आज हमे इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी देखने जाना था और बाकी बचे समय का
कुछ नहीं पता था कि क्या करना है। ऐसे घूमने में बहुत मजा आ रहा था। हमारे आगे कोई लक्ष्य नहीं था। हम जहाँ मर्जी वहां जा सकते थे, जहाँ मर्जी वहां बैठ सकते थे। घड़ी की सूई दौड़ रही थी पर शायद हमारे लिए इसका कोई मायने नहीं था। तभी तो बिना समय की पाबंदी के यूं घूमने में मजा आ रहा था। नहीं तो आमतौर पर हम लोग घूमने भी भागा-दौड़ी में ही जाते है। बिलकुल सीमित समय के लिए। कम से कम समय में, ज्यादा से ज्यादा जगह घूमना चाहते है हम। समय के अभाव में हम अपनी रोजमर्रा के जीवन में तो व्यस्त रहते ही है साथ में कही घूमने का मौका मिले तो उस पर भी हमारी ये (कम समय में ज्यादा जगह देखने की) आदत भारी पड़ जाती है। नतीजन जिस भाग-दौड़ भरे जीवन को छोड़कर, सुकून के कुछ क्षण बिताने घर से बाहर निकलते है वो सुकून ढूंढने पर भी कही नज़र नहीं आता। इसके जिम्मेदार और कोई नहीं हम ही है। यहाँ मेरा भाग्य मेरे साथ था तभी तो मुझे यूं बेफिक्री के साथ घूमने में मजा आ रहा था। और इसके लिए मैं घर से ही तैयार हो के आया था। घर से ही मन बना लिया था कि इस बार घूमने में जल्दबाजी नहीं करनी। ऐसा लगना चाहिए कि सच में हम छुट्टियाँ मनाने आये है ना की किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए। 



कल दोपहर बाद का समय भी हमने ऐसे ही रिज पर बिताया था। बहुत आराम मिला। ना केवल शरीर बल्कि दिमाग भी पूरी तरह चुस्त हो गया। इसका पूरा श्रेय कल रिज पर बिताये खाली समय को जाता है। इस यात्रा में इतना मजा आया कि मैंने आने वाली यात्राओं में बिना किसी लक्ष्य की यात्रा करने का मन बना लिया है। जिसमे बिना किसी जल्दबाजी के मैं कहीं भी जा सकूँ, रुक सकूँ, बैठ सकूँ बिना किसी फिक्र के। किसी बात की जल्दी ना हो, कहाँ जाना हो ये भी पता ना हो। ऐसी यात्रा भविष्य में जरूर करनी है। 



रास्ते में एक बेकरी की दुकान खुली मिल गयी। उससे एक कॉफी ली। अब दो काम थे। पहले कैमरे के लिए शेल लेना और नाश्ता करने की लिए कोई बजटीय दुकान की तलाश करना। मॉल रोड़ से ए.जी.चौक जाते समय, मॉल रोड़ पर ही दायीं ओर 8-10 सीढ़ियां नीचे उतरकर कुछ बजटीय दुकानें दिखी। उन्ही में से एक पर चले गए। अभी पिछले महीने ही यूपी में मुख्यमंत्री के लिए चुनाव हुए थे और आज उसका परिणाम घोषित होना था। सभी न्यूज़ चैनल पर सिर्फ ये ही खबर आ रही थी। हमने भी वोट दी थी और परिणाम जानने की मेरी भी इच्छा थी। इसलिए दुकान में ऐसी टेबल लपकी जहाँ से टीवी आराम से देखा जा सके। भीड़ ना होने की वजह से पसंदीदा सीट हड़पने में ज्यादा मेहनत नहीं लगी। नाश्ते के लिए चना-भटूरा बोल दिया। उधर दुकान का मालिक भी यूपी चुनाव में कुछ ज्यादा दिलचस्पी ले रहा था। आस-पास का पूरा माहौल परिणाम की ही चर्चा से गर्म था। हिमाचल में यूपी के चुनाव का ऐसा जबरदस्त माहौल है तो यूपी में क्या हो रहा होगा इस वक़्त ? जो भी कोई ग्राहक वहाँ आ रहा था वो खाने का ऑर्डर बाद में दे रहा था पहले चुनाव के बारे में अपने विचार सभी के समक्ष रख रहा था। ज्यों-ज्यों प्लेट से भठूरे कम होते जाते यों-यों बीजेपी की सीटे बढ़ती जाती। चुनाव के नतीजे देखने के चक्कर में भठूरों के बाद चाय, पापड़ी भी लिये गए। यहाँ का इतना खाना मात्र 200 रुपए में निपट गया जोकि शिमला के हिसाब से बहुत सस्ता था। इधर दुकानदार को पैसे दियें उधर नतीजा आ गया। वो बताने की यहाँ जरुरत नहीं है ये तो सभी तो पता है कि कौन जीता और कौन हारा। 



अब तक दुकानें भी खुलने लगी थी। एक दुकान खोजकर अब कैमरे को भी नाश्ता करा दिया। मतलब उसके शेल ले लिए। और सबसे पहले दिन लिए होटल डलझील की तरफ अपना सामान लेने चल दिए। आज घूमने के लिए भी हमे उसी तरफ ए.जी.चौक से होकर ही जाना था। होटल पहुँच मैंने उनसे अपना सामान ले लिया। यहाँ मुझसे एक गलती हो गयी और उस एक गलती ने पूरा दिन खराब कर दिया। मैंने ऑनलाइन एक होटल देखा जो यहाँ से दूर था और अपेक्षाकृत सस्ता भी। डलझील होटल के मैनेजर से मैंने उस होटल का पता दिखाया तो उसने बोला कि यह ठीक जगह है और ज्यादा दूर भी नहीं है। इसकी लोकेशन समर हिल की तरफ दिखा रहा था। उससे अच्छे से पूछ कर मैंने वो होटल ऑनलाइन बुक कर दिया। और वहाँ से सामान उठा आगे चल दिए। होटल से आगे आते ही वही तिरहाया आता है जहाँ जाते समय वो कुली लड़का मिला था जिसने होटल का पता नहीं बताया। इस तिराहे से एक रास्ता बायीं ओर नीचे की तरफ जाता है इस रास्ते पर थोड़ा आगे चलकर टी मोड़ आता है जो बायीं ओर शिमला बस अड्डे की तरफ जाता है और दायां रास्ता रेलवे स्टेशन की तरफ जाता है। और एक रास्ता इस तिराहे से सीधा जाता है जो इंस्टिट्यूट को जाता है और ये ही रास्ता समर हिल को भी जाता है।  ए.जी.चौक तिराहे के कोने पर शिमला पासपोर्ट ऑफिस भी मौजूद है। हमे सीधे जाने वाले रास्ते पर जाना था जो समर हिल को जाता है। आज हम दोनों सुबह नहा कर कपड़े नहीं बदल पाए। कारण वही, सामान इस होटल में रखा हुआ था। हमारे पास अतिरिक्त कपड़े नहीं थे जो कुछ था वो होटल के लॉकर में कैद था।और अब सामान लिया भी यहाँ से तो अब कपडे बदलेंगे कहाँ ? होटल वाले से ही निवेदन करते तो वो हमे चेंज करने को शायद जगह भी दे देता पर इसकी हमे कोई खास जरुरत महसूस नहीं हुई. इसलिए आज, कल वाले कपड़ों में ही घूमे। इस तरफ इक्का-दुक्का आदमी ही देखने को मिला। कारण ये कि एक तो अधिकतर लोगों की जानकारी शिमला यानी रिज और मॉल रोड़ तक ही सीमित है। दूसरा जिनको पता भी है वो इस तरफ टैक्सी या अपनी कार से आना पसंद करते है। 



हम अब लगातार नीचे ढलान पर उतर रहे थे।  कुछ आगे जा कर हमे बायीं ओर हिमाचल प्रदेश विधान सभा की इमारत मिली। और उससे कुछ ही आगे पाँच सितारा होटल ओबरॉय और उसके जैसे कुछ पांच सितारा होटल देखने को मिले। जो मॉल रोड़ की भीड़-भाड़ से 1 किलोमीटर अलग थे। हम यूं ही मस्ती में बात करते हुए आराम-आराम से चलते रहे। 



यहाँ की एक बात और जिसकी तरफ मेरा ध्यान गया वो यह है कि शिमला में युवा वर्ग का जमावड़ा है। इसका कारण है कि यह हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। और राजधानी होने की नाते यहाँ पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी है। दूर-दूर के पहाड़ी गाँव से माँ-बाप अपने बच्चों को यहाँ पढ़ने को भेजते है। जैसे हमारे यहाँ सभी दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ना चाहते है ठीक वैसे ही यहाँ पर ये पहाड़ी परिवार अपने बच्चों को शिमला अच्छी शिक्षा लेने को भेजते है। ये लड़के-लड़कियां समूह में या एकल प्रेमी जोड़ों के रूप में यहाँ घूमते हुए मिल जाते है। 



कुछ आगे जाते ही अम्बेडकर चौक आता है। इस चौक के बायीं तरफ हिमाचल स्टेट म्यूजियम लाइब्रेरी और दायीं तरफ डाकघर है। यहाँ से एक रास्ता सीधा जाता है, एक ऊपर संग्रहालय की तरफ और एक रास्ता दायीं ओर जाता है। इसी दाये रास्ते पर आगे चलकर पहले यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ बिज़नेस स्टडीज और बाद में राजीव गांधी गवर्नमेंट कॉलेज आता है। इसी मोड़ पर एक कैंटीन भी है जहाँ बहुत सारे टैक्सी ड्राइवर चाय पी रहे थे। बाहर गाडी खड़ी देख नीतू ने कहाँ की होटल तक कार से चल लेते है फिर सामान रखकर वहाँ घूम लेंगे। नीतू की बात मुझे माननी पड़ी क्योंकि सारा सामान मैं अकेला ही ढोह रहा था। और मेरे हाथ अब दुःख रहे थे। मैं उस कैंटीन में गया उस होटल का पता पूछने लगा। उनमे में से एक बोला कि वो अभी काफी दूर है आप टैक्सी कर लो। पैसे पूछने पर उसने 1000 रुपए बोला। मैं बिना बातचीत आगे बढ़ाये वहां से बाहर आ गया। इस मोड़ से तीन रास्ते आगे जाते है जो सभी आगे जाकर एक ही मोड़ पर मिल जाते है। यहाँ से दायीं तरफ वाला रास्ता मुझे लुभा रहा था। यह रास्ता जंगल की तरह था बिलकुल एकान्त में। मुझे रास्ता बहुत पसंद आया। एकदम शांति, बड़े-बड़े पेड़ और मानस तो कोई दिख ही नहीं रहा था। कितनी भी तेज बातें करो यहाँ हमारी सुनने वाला कोई नहीं था। 



इस रास्ते का लुफ्त उठाते अभी कुछ आगे ही बढे थे कि बहुत तेज बारिश शुरू हो गयी। बेटे को तो छाते में छिपा लिया। पर मैं भीग रहा था। हमारे आस-पास सर छिपाने को कोई जगह भी नहीं थी। बारिश और तेज हो गयी तभी एक कार वाला सामने से आता दिखाई दिया। मैंने उसे हाथ दिया और होटल जाने को पूछा तो 250 में बात पक्की हो गयी। यदि कही सर छिपाने की जगह मिल जाती तो मैं होटल तक पैदल ही जाता पर इस रस्ते पर आ कर तो अब फस गए। मजबूरन मुझे गाडी करनी पड़ी। गाड़ी में बैठते ही बारिश और तेज हो गयी। खुशी भी हो रही थी कि बारिश में भीगने से बच गए और दुख भी हो रहा था की बिना बात के पैसे देने पड़ रहे है। कार से लगभग 5 किलोमीटर और चले पर होटल नहीं आया। वही घना जंगल देख नीतू को डर लग रहा था कि हम यहाँ कैसे रहेंगे। अब मुख्य रास्ते से एक रास्ता दायीं ओर नीचे को जाता है। कार इसी कच्चे रास्ते पर चलने लगी। इस कच्चे रास्ते पर भी लगभग 2 किलोमीटर और चले पर होटल अभी भी दूर था। इस 2 किलोमीटर के रास्ते पर हमे एक भी आदमी दिखाई नहीं दिया। अब इतने नीचे आने पर भी होटल नहीं आया तो मेरा मन भी बेचैन होने लगा। तभी आगे का कच्चा रास्ता इतना ख़राब आया कि कार क्या बाइक निकालने में भी परेशानी होगी। यहाँ ड्राइवर ने कार रोक दी और आगे जाने से मना कर दिया। थोड़ा आगे एक घर था। उस घर के बाहर एक घने बालों वाला कुत्ता बंधा था जो हमें देख भोंक रहा था और अपनी रस्सी तोड़ने की कोशिश कर रहा था। उसके स्वभाव से साफ़ पता चल रहा था कि यहाँ कोई आता जाता नहीं है तभी तो वो कुत्ता हम पर ऐसे झपटने की कोशिश कर रहा था मानो हम इंसान नहीं उसका शिकार हो। आगे का रास्ता बहुत खराब था। पैदल ही आदमी जा सकता है और यदि हम आगे पैदल जायें और आगे कुत्ता या ऐसे कुत्तों का झुण्ड हमसे टकरा गया तो...। उनसे बचना भारी जो जायेगा चलो इनसे निपट भी लिए तो होटल का भी नहीं पता कितना आगे और है.... । थोड़ा और नीचे जाकर भी होटल नहीं मिला तो वापस ऊपर आने की लिए कोई साधन नहीं मिलेगा....। और ना ही यहाँ मोबाइल में नेटवर्क आ रहे थे जो किसी से मदद ली जा सके....। यही मन में चल रहा था की पिछली सीट से नीतू बोली की वापस चलो। ये जगह बहुत ही दूर है और रास्ता भी बहुत खराब है। इतना मैं भी जनता था की इण्डियन इंस्टिट्यूट बहुत पीछे छूट चुका है और बारिश अभी भी हो रही है। मैंने फिर सोचा यदि हमे समर हिल के पास कमरा मिल जाए तो भी ठीक है आज समर हिल में घूम लेंगे और कल सुबह समर हिल से इण्डियन इंस्टिट्यूट देखते हुए पैदल ही शिमला स्टेशन चले जायंगे। 



यहाँ से मेरी बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया और मैं पता नहीं क्यों अजीबो गरीब योजना बनाने लगा। मैंने ड्राइवर को कार वापस मोड़ने को बोल दिया। और उसी से बोला की अपने किसी जानकार से बात करों कि समर हिल के पास कमरा दिला दे। उसने कई जगह बात की पर आज शनिवार, कल रविवार और फिर होली होने की वजह से कही कमरा खाली नहीं मिला। अब क्या वापस चलने को बोल दिया। बातों के चक्कर में और गाड़ी वाला मार्ग अलग होने के कारण ए.जी.चौक कब पीछे छूट गया पता ही नहीं चला। जब ध्यान दिया तो हम लिफ्ट के पास थे। मैंने गाड़ी वाले को यही छोड़ने को बोल दिया। इस समय मूँड़ बहुत ख़राब था। कही घूमे भी नहीं आज। कार वाले ने 500 रुपए मांगे पर बात करने पर वो 400 में मान गया। बारिश अभी भी पड़ रही थी। जल्दी से लिफ्ट की तरफ गए। 30 रुपए के 3 टिकट लिए 2 अपने और एक बड़े बैग का। यहाँ से ऊपर मॉल रोड़ तक जाने के लिए 2 लिफ्ट बदलनी पड़ती है। एक आदमी का किराया 10 रूपये है और यदि बड़ा बैग हो तो उसका टिकट भी 10 रुपए ही लगता है। आमतौर पर यह लिफ्ट ऊपर मॉल रोड़ को नीचे कार पार्किंग और बस अड्डे आने वाले लोगों को सहूलियत देती है। यदि लिफ्ट से ना जाकर रोड़ से ही ऊपर जाना चाहे तो उसे दूसरी तरफ से घूम कर और ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है। और लिफ्ट से सिर्फ 2 मिनट में मॉल रोड़ पहुँच जाते है। जितना पिछले 2 दिन से मैं खुश था आज उतना ही बेकार लग रहा था और गुस्सा आ रहा था होटल के मैनेजर पर जिससे मैंने होटल का पता पूछा था। उसे पता वता कुछ नहीं था बस ऐवें ही लपेट दिया। एक गलत आदमी के गलत सुझाव से आज का दिन खराब हो गया। 



इसी आपाधापी में दोपहर के 3 बज गए थे। ना आज कुछ खास घूमे और ना ही अभी तक ठहरने का ठिकाना मिला। मॉल रोड़ पहुँच मैं थोड़ी देर को बैठ गया और नीतू को मना कर दिया कि अभी कुछ देर मुझसे बोलना मत। जब दिल और दिमाग दोनों ही स्थिर ना हो तो कोई फैसला नहीं लेना चाहिए नहीं तो सब कुछ उल्टा ही होता है। जैसे यहाँ मेरे साथ हो रहा था।कुछ देर शांत बैठने से दिमाग कुछ स्थिर हुआ। भूख भी लग रही थी। एक जगह रुक कर खाना खाया। हल्की-हल्की बर्फ गिरने लगी थी। तो मन को शांत करने के लिए इसी का सहारा लिया गया। यूँ ही बर्फ में चलते रहे। कहाँ जाना है? नहीं पता बस चलते रहे। 

नीतू ने मुझसे पूछा कि"हम अब कहाँ जा रहे है।"
मैंने माहौल को हल्का करने के लिए कहाँ "समय बलवान है। जहाँ ये ले जायेगा वही चल देंगे।"
"मजाक मत करो ठीक से बताओं"
"कुफरी चले ?"
पर नीतू का ये सब होने की वजह से मन ठीक नहीं था। उसने मना कर दिया। मैं बिना किसी बहस किये आगे बढ़ गया। होटल क्लासिक में हमने कमरा लिया। ये ए.जी.चौक पर स्थित है। कमरा बाकी दिनों के हिसाब से महंगा मिला। बार-बार बताने की जरूरत नहीं है कि आज मेरा समय ही ख़राब चल रहा था। इसलिए होटल कौन सा सस्ता मिल जाता। 

शाम के 4 बज रहे थे। अभी बारिश हो रही थी इसलिए कुछ देर आराम करने में ही भलाई थी। हमारे कमरे की खिड़की से दूर तक पहाड़ दिखाई दे रहे थे। बारिश रूकी तो तब तक अँधेरा होने को था। आज के ख़राब दिन की वजह से नीतू का तो अब घूमने का बिलकुल मन नहीं था। उसने मुझसे कहाँ की कल (12 मार्च ) शाम हमारी ट्रेन है। अब सीधा उसमे बैठेंगे। उसका ये रूखापन जायज था। मैंने उसको समझाया कि हर दिन एक सा नहीं होता। आज का दिन बेकार रहा इसका ये मतलब तो नहीं कि बाकी दिन भी बेकार ही रहेंगे। और ना ही इसकी वजह से घूमना बंद किया जा सकता है। हाँ इससे सीखा बहुत कुछ जा सकता है। ये ही तो यात्रा होती है जिससे कभी अच्छे तो कभी बुरे अनुभव मिलते है। दोनों ही क्षण हमारी यात्रा का ही हिस्सा होते है। नीतू को मेरी बात समझ आ गयी और उसने कल फिर घूमने के लिए हाँ कर दी। 8 बज गए थे। होटल से बाहर एक जगह खाना खाया और होटल वापस आ सो गए। 


आज हम कही नहीं घूमे पर चले बहुत। आज की हमारी हालत पर एक लाइन बहुत सटीक बैठती है - "खाया पिया कुछ नहीं और गिलास तोडा बारह आना"





























नीचे जो सफेद रंग की पट्टी दिखाई दे रही है वो हैलीपैड है। 











नगर निगम का पार्क (सामने दिखाई देता ए.जी.चौक पर शिमला पासपोर्ट कर्यालय) 







यही रास्ता समर हिल को जाता है। 



सारा सामान लिए खड़ा एक मानस 



एक कदम भविष्य की ओर 











होटल के कमरे से रात को बाहर का नज़ारा 


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शिमला यात्रा के सभी भाग (आप यहाँ से भी शिमला यात्रा के सभी भाग पढ़ सकते है।)-
1. अबकी बार शिमला यार - Abki Baar Shimla Yaar
2. लो आखिर आ ही गयी ट्रेन - Lo Akhir Aa Hi Gayi Train
3. कालका-शिमला टॉय ट्रेन का सफर - Kalka-Shimla Toy Train Ka Safar
4. जाखू मंदिर, शिमला - Jakhu Mandir, Shimla
5. मैं और हसीन वादियां शिमला की - Main Or Haseen Yadiyan Shimla Ki
6. यात्रा का दूसरा पहलू - Yatra Ka Dusra Pahalu 
7. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला - Indian Institute Of Advanced Study, Shimla

8. हिमाचल राज्य संग्रहालय, शिमला - Himachal State Museum, Shimla


4 comments:

  1. बारिश की वजह से परेशानी हुई आपको

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    1. हाँ भाई बारिश और एक होटल के मैनेजर की गलत सलाह ने पुरा दिन बेकार कर दिया था।

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  2. Baris ka bhi apna maza hai gaurav bhai

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    1. हां, बारिश अपने साथ सुहाना मौसम जो साथ लाती है।

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