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Monday, 1 May 2017

मैं और हसीन वादियां शिमला की - Main or Haseen Vadiyan Shimla Ki

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दिनांक- 10 मार्च 2017, दिन- शुक्रवार  


कुछ देर आराम कर फिर से घूमने को निकल गए। होटल से बाहर आये तो अब धूप निकल रही थी। रास्तों पर गिरी बर्फ धूप के कारण पिघलकर बह रही थी जो हमारे गीले जूतों को और गीला कर रही थी। दोपहर के 3 बज रहे थे। टहलते हुए हम फिर से रिज पहुँच गए। यहाँ क्रेन से बर्फ हटाने का काम जोरो से चल रहा था। बर्फ जल्द से जल्द हट सके और सभी घूमने आये लोगों को परेशानी ना हो इसलिए ये काम बर्फ गिरने के बंद होते ही शुरू कर दिया गया था। कितना ख्याल रखा जा रहा है यहाँ हमारा और हमारे जैसे घूमने आये बाकि लोगों का। कुछ देर के लिए तो वी.आई.पी जैसा महसूस हुआ। लगा जैसे हम कोई अफसर या नेता है और ये हमारा हर तरह से ध्यान रखने की कोशिश कर रहे है। कुछ देर के लिए ही सही इन्होने हमे बतलाया कि हम कितने खास है इनके लिए। अच्छा भी है ये। जहाँ की अर्थ
व्यवस्था पूरी तरह बाहर से घूमने आये शैलानियों पर आश्रित हो। वहाँ पर उन शैलानियों को घूमने में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। ये बात यहाँ की सरकार अच्छे से जानती है। 


यूँ ही टहलते हुए हम दौलत सिंह पार्क में चले गए। यहाँ पानी निकले की जगह ना होने की वजह से थोड़ा पानी भरा हुआ था। जो कुछ देर पहले गिरी बर्फ से ही बना है। मौसम बिल्कुल साफ था। बादल अपने-अपने घर जा चुके थे। दूर तक के नज़ारे अब साफ़ दिखाई देने लगे थे। पानी से बचते-बचाते कुछ फोटो लिए। 



इस पार्क में इंदिरा गांधी की प्रतिमा है। इस प्रतिमा का अनावरण 26 जनवरी 1990 को उस समय हिमाचल के मौजूदा मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह के द्वारा किया गया था। दूसरी प्रतिमा है डा. यशवन्त सिंह परमार की। इनकी प्रतिमा के नीचे दी गयी जानकारी के अनुसार इन्हे हिमचाल का निर्माता बताया गया है। ये 75 साल तक जीवित रहे। इनका जन्म 1906 में हुआ और मृत्यु सन 1981 में हुई थी। यहाँ एक और प्रतिमा थी जो बहुत ही खास थी और जिनके नाम पर इस पार्क का नाम रखा गया। यह प्रतिमा स्व. जनरल दौलत सिंह की है। ये शिमला में 8 मई 1961 से 22 नवंबर 1963 तक पचिमी कंमांडो के मुख्य जनरल ऑफिसर थे। एक मिशन के दौरान 22 नवंबर 1963 को पूंछ, जम्मू-कश्मीर में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में शहीद हो गए। ये पार्क इन्ही की याद में 2 अप्रैल 1964 में बनवाया गया था। 



रिज पर चारों तरफ बैठने के लिए बेंच लगाई हुई है। इस समय यहाँ काफी लोग थे। सभी धूप का मजा ले रहे थे। शैलानियों के साथ-साथ स्थानीय लोग भी यहाँ बैठ विटामिन डी की कमी को पूरा कर रहे थे। एक और बात यहाँ किसी भी तरह का वाहन लाना वर्जित है। इस तरफ आये सभी वाहनों को नीचे ए.जी.चौक के पास ही रोक दिया जाता है। यहाँ होटलो में ठहरे लोगों के वाहनों के लिए नीचे बस अड्डे के पास पार्किंग बनायीं गयी है और जो शिमला से आगे जाना चाहता है उसके लिए उसे दूसरी रोड़ से होकर जाना होता है। यहाँ सिर्फ एम्बुलैंस, पुलिस की गाडी या किसी सरकारी महकमें में कार्यरत अफसर की गाडी ही आ जा सकती है। बाकियों को आने जाने की लिए दूसरा रास्ता पकड़ना पड़ेगा जो बस अड्डे के पास से होकर आगे जाता है। तो यहाँ जो भीड़ थी सिर्फ पैदल लोगों की होती है।  



कुछ देर शरीर को आराम देने की लिए इसे एक बेंच पर पटक दिया। ऊपर जाखू मंदिर की ओर देखने पर वहाँ का नज़ारा अद्भुत था। सभी पेड़ बर्फ की सफ़ेद चादर में लिपटे हुए थे। जो उस नज़ारे को और भी खूबसूरत बना रहे थे। डुग्गु कही से ढूंढ ढांढ कर बर्फ उठाकर लाता और रहा चलते किसी के भी दे मरता। डुग्गु नियम का पक्का है उसने सिर्फ लड़कियों पर ही बर्फ फेंकी, लड़को पर बिल्कुल नहीं। और कोई भी उसके यूँ बर्फ फेकने से नाराज़ भी नहीं हो रही थी। हमने भी डुग्गु को ऐसे करने से रोका नहीं। थोड़ी देर में नीतू चाय लेने बराबर वाली दुकान पर चली गयी और मैं वही पसरा रहा। बराबर में एक तिरंगा लहरा रहा था। जिसे देख सभी लोगों को फक्र हो रहा होगा। तिरंगे की उचाई लगभग 100 फ़ीट होगी ही ।  



सूरज ढलने तक मैं एक सीट पर ही जमा रहा। मजा आ गया सर्दी में धूप लेने में। बड़े दिनों बाद इतनी फुर्सत मिली। रोजमर्रा के जीवन में कहाँ इतना आराम मिल पाता है जो घंटो एक जगह बिना सोचे या बिना कुछ किये बिताया जा सके। आज तो कई घंटे धूप ली। शरीर में विटामिन डी का भण्डार पूरा हो गया। धूप जाते ही सर्दी बढ़ने लगी। यहाँ से उठ हम मॉल रोड़ की और वापस चलने लगे। चर्च की ओर से मॉल रोड़ पर थोड़ा नीचे उतरते ही एक रानी झांसी पार्क आता है। इसमें बच्चों के लिए बहुत से झूले लगे है। इस समय पार्क खाली था। बर्फ की वजह से सभी झूले भीगे हुए थे और ऊपर पेड़ो से भी पानी टपक रहा था जो उन्हें सूखने नहीं दे रहा था। इसलिए ये खाली थे। बिना बच्चों के तो ये झूले भी बेजान लग थे। इन्हे देख ऐसा लग रहा था मानो ये कह रहे हो की आओ हमारे पास आओ और हम पर झूल कर हम में भी जान फूँक दो। इनकी सुंदरता बच्चों से ही तो है। जिस तरह नयन की सुंदरता काजल के बिना अधूरी होती है उसी तरह बिना बच्चों के इन झूलों की सुंदरता नगण्य है।आगे बढ़े तो बेटे को अचानक खिलौनों की दुकान दिख गयी। फिर क्या..... एक कार ली जिसके आगे वाले दोनों दरवाज़े बाकायदा खुलते है और कार के आगे-पीछे आल्टो की प्लेट लगाई हुई है। लड़का अब कार को देख चहक रहा था। अब अँधेरा हो गया था। हम होटल के पास पहुँच गए पर होटल में ना जाकर थोड़ा और आगे घूमने निकल गए। थोड़ा सा आगे ही दायी ओर लिफ्ट है जो 10 रुपए सवारी के हिसाब से लोगों को नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे ले जा रही थी। लिफ्ट के बारे में विस्तार से अपनी अगली पोस्ट में लिखूँगा। लिफ्ट से कुछ ही दूरी पर बायीं ओर एक खेल भवन (स्पोर्ट कॉम्पेक्स) बना हुआ है। इसका नाम इंदिरा गांधी स्पोर्ट कॉम्प्लेक्स है। यही तक घूम हम वापस होटल की ओर चल दिए। 



हमे पहले वाले होटल के लॉकर में रखा हुआ अपना सामान वापस लाना था पर उधर जाने की इच्छा नहीं हुई। मैंने तभी उस होटल में फ़ोन करके बोल दिया कि हम कल सुबह आएंगे अपना सामान लेने। होटल में ही फिर शाम का खाना खाया और सो गए। 














बर्फ की ओट में 




शिमला में नीचे की तरफ गिरी बर्फ 















रिज की बगल से झाकती सच्चाई 




मौसम खुलने के बाद का दृश्य 








स्वर्गीय जनरल दौलत सिंह की प्रतिमा 



तूफानी बन्दर 


सामने दिखाई देते बर्फीले पहाड़ 


अतुल्य 







नोट: इस फोटो में साथ खड़ी लड़की से मेरा कुछ भी लेना-देना नहीं है। 







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