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Monday, 3 April 2017

लो आखिर आ ही गयी ट्रेन- Lo Aakhir Aa Hi Gayi Train



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ट्रेन प्लेटफार्म पर आने से कुछ सेकंड पहले नीतू स्टेशन पर लगी एल.इ.डी. को बड़े ध्यान देख रही थी। जिस पर ये दर्शाया जा रहा था कि कौन सा डिब्बा कहाँ पर आएगा।  
"हमारा स्लीपर डिब्बा वहां आगे आएगा और हम यहाँ इतने पीछे क्यों खड़े है।" नीतू ने मुझसे कहाँ। 
जिसको मेरे द्वारा डाउनलोड किये एप पर भरोसा नहीं उसको रेलवे द्वारा लगायी गयी एल.इ.डी. पर इतना विश्वास देख मैं हैरान था। मैंने बोला
"यह रेल है मेट्रो नहीं " जो ये एल.इ.डी. हमे सटीक जानकारी देंगे। हमारा डिब्बा पीछे ही आएगा। और हुआ भी वही जहां हम बैठे थे उसी के पास ही हमारा डिब्बा था। बस फिर क्या था फटाफट ट्रेन में चढ़ गए। 



सीट खोजना शुरू किया तो पाया कि हमारी दोनों सीटो पर दो महाशय चादर ताने सोए हुए है। हमारी सीट कुछ ऐसे थी की एक तो सबसे ऊपर की 53 और दूसरी सीट, पहली सीट की सामने वाली लाइन में बीच (मध्यम) वाली 51 न.। 51 वाली सीट पर से मैंने सोये हुए मानव को जगाया। वो भला आदमी लग रहा था और साथ में समझदार भी। बिना किसी बात के वो समझ गया कि इस सीट के मालिक आ गए है। फट से उसने वो सीट छोड़ दी। मैंने बेटे को उस पर लेटा दिया और सामान सबसे निचली सीट के नीचे रख दिया। वैसे हमारे पास सामान भी बहुत हो गया था -एक पहिये वाली अटैची, एक पिट्ठू बैग मेरा और एक नीतू का। सामान रख कर मैं सबसे नीचे वाली सीट पर बैठ गया और नीतू बेटे के पास चली गयी। 


दिल्ली तक तो मैं नीचे ही बैठा था और मेरे बराबर में भी 2 लोग बैठे थे। पर वो सीट उनमे से किसकी थी ये नहीं पता था। शुरू में तो मुझे लगा कि वो मेरी सीट पर सोया आदमी इन्ही के साथ है और उनकी हलचल से लग रहा था की ये अगले ही स्टेशन यानी दिल्ली पर ही उतरेंगे। इसलिए मैंने सोचा 5 मिनट की बात है वो आदमी मेरी सीट से अपने आप हट जायेगा। कोई नहीं सोने देता हूँ। इतनी उदारता मैं दिखा देता हूँ इसमें कुछ नयी बात नहीं है। ट्रेन धीमी रफ़्तार से दिल्ली पहुँची। ये क्या उतरने की तो छोड़ो, वो तो जरा सा हिला भी नहीं। अब बस मुझे भी अपनी सीट का मालिकाना हक जाहिर करने की त्रीव इच्छा हुई। मैंने उसको हलके से हिलाया पर वो तो इस जग में जैसे था ही नहीं। उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर मैंने उसको बढ़िया तरीके से झंझोड़ दिया। उसने उठकर अपनी कोलकाता की भाषा में मुझसे पूछा "क्या हुआ "। पहले वाला समझदार था पर ये नहीं। मैंने उसको बताया कि इस सीट का मालिक अब मैं हूँ। उसने अपना टिकट पर देखा तो बोला "यही तो मेरी सीट है।"
एक बार तो सोचा ये क्या नई आफत है एक सीट और आदमी दो। 
मैंने पूछा "सीट न. क्या है ?"
"54"
"तो भाई तेरी सीट ये है बीच वाली" 
इतना कहते ही वो फट से उठा और अपनी बीच वाली सीट लगा ली। मैं अपनी सीट पर जाकर लेट गया। जब तक ये वाक्य हुआ ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर ही खड़ी थी। यहाँ पर यह 40 मिनट रूकती है। 


बाहर को मौसम मार्च होने के कारण बार-बार बदल रहा था। कभी ठंड हो जाती तो कभी गर्मी। कुछ ही देर में बारिश शुरू हो गयी। मौसम बहुत ही सुहाना लगने लगा। जो दिमाग इधर-उधर की बातों में व्यस्त था वो कुछ देर में लिए थम सा गया बारिश को महसूस करने के लिए। ये बारिश को मौसम होता ही ऐसा है यदि आप खुश हो तो ये आपकी ख़ुशी को दोगुना-चौगुना कर देता है और दुखी हो तो आपके दुख को बढा देता है। हमे तो जाने की इतनी ख़ुशी थी इस बारिश ने उसको और बढा दिया। ट्रेन की छत पर पड़ रही बूंदों की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही रही थी। इनको ओर करीब से महसूस करने के लिए मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। यह पल मेरे लिए बहुत ही सुकून देने वाला पल था। किसी भी तरह का कोई शोर नहीं था बस एक धीमी सी आवाज़ थी इन बूंदों की। एक रेल के डिब्बे की किसी सीट पर लेटे हुए मैं इतना अच्छा महसूस करूँगा कभी सोचा ना था। मन कर रहा था कि यह आवाज़ मेरे कानों में पड़ती रहे। इसे सुनकर लग रहा था मानो जैसे ये बारिश की बूंदे ना हो कोई मधुर संगीत हो जो मुझे मोहित करने की कोशिश में लगा हुआ है। इस संगीत का आनंद लेने के लिए मैं आँखें मूंदे लेटा रहा और कब नींद आ गयी पता भी ना चला। 


ट्रेन ने चलने के लिए हॉर्न दिया तो तुरंत आँख खुल गयी। मैं पहली बार रात को ट्रेन का सफर कर रहा था और आरक्षित (रिजर्वेशन) भी मैंने पहली बार कराया था। अब से पहले भी ट्रेनों में सफर किया है पर केवल पैसेंजर ट्रेनों में ही। एक्सप्रेस में भी दो चार गया हूँ पर जनरल डिब्बे में सवार होकर। इसलिए आज का सफर मेरे लिए एक नया और अच्छा अनुभव था।इस ट्रेन का न. है 12311 है और जब ये कालका से दिल्ली होते हुए वापस हावड़ा को जाती है तो इसका न. बदलकर 12312 हो जाता है।  यह ट्रेन पहले हावड़ा से दिल्ली के बीच ही चलती थी। इसे सन 1866 में आरम्भ किया गया। 25 साल बाद 1891 में इस लाइन का विस्तार कर इसे कालका तक बढा दिया गया। इसे अंग्रेजों ने अपनी सुविधाओं के लिए चलाना शुरू किया था। ताकि वो लोग कोलकाता जो उस समय भारत की राजधानी हुआ करती थी से दिल्ली और शिमला आसानी से आ जा सके। इस बात से यह तो साबित होता है कि उस समय किसी भी भारतीय को इसमें बैठाया नहीं जाता होगा। यह ट्रेन 151 साल से हमारी सेवा में लगी हुई है।  


हावड़ा से चलकर यह ट्रेन दुर्गापुर-असनसोल ज.-नेताजी सुभाष चंद्र बोस ज.- हज़ारीबाग़ रोड- गाया ज.- मुग़ल सराय जंक्शन- मिर्ज़ापुर- इलाहाबाद ज.- फतेहपुर- कानपुर सेंट्रल- इटावा ज.-शिकोहाबाद ज.- फ़िरोज़ाबाद-हाथरस ज. - अलीगढ ज. - खुर्जा ज. होते हुए ग़ाज़ियाबाद पहुंचती है। ग़ाज़ियाबाद आते-आते यह तक़रीबन 1425 किलोमीटर का सफर तय करती है। और ग़ाज़ियाबाद से चलकर मुख्यत दिल्ली- सब्ज़ी मंडी, दिल्ली - सोनीपत- गनौर- समालखां- पानीपत- करनाल- कुरुक्षेत्र- अम्बाला कैंट- चंडीगढ़ जंक्शन- चंडी मंदिर होती हुई कालका पहुँचती है। और  इस तरह यह ट्रेन अपने हावड़ा से कालका तक के सफर में लगभग 1714 किलोमीटर का एक लम्बा सफर तय करती है। यह सफर इसके द्वारा 32 घंटे 45 मिनट पूरा किया जाता है। इस हिसाब से इसकी औसतन चाल 52 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। लेकिन यह अधिकतर अपने निर्धारित समय से लेट ही रहती है। यदि इसका भी हिसाब लगाया जाये तो इसकी रफ़्तार लगभग 47-48 किलोमीटर प्रति घंटा ही मिलेगी। अपने पूरे सफर में यह तक़रीबन 40 स्टेशनों पर रूकती है। पर दूसरी ट्रेनों को पास कराने के लिए भी बीच में छोटे स्टेशन पर भी इसे रोक लिया जाता है। जिससे यह और लेट हो जाती है। 


वैसे तो इसको 30-40 मिनट ही दिल्ली रुकना था पर रेलवे वाले इसे यही खड़ी करके मानो जैसे भूल ही गए। यह दिल्ली से 02:30 चली। ट्रेन दिल्ली से चलकर अपनी मंज़िल को ओर चल पड़ी। अब इसकी (बार-बार नाम नहीं लूँगा समझ जाना) मंज़िल और हमारी मंजिल फिलहाल एक ही थी। इसका भी आखिरी स्टेशन कालका था और हमे भी कालका ही उतरना था। नींद आराम से आनी चाहिए। पर नहीं आयी। नींद ना आने के 2 कारण थे। एक तो मुझे सर्दी लग रही थी और ओढ़ने को कोई कपड़ा नहीं था। इतना सामान होने के बाद भी हम बस एक ही खेस (चादर) रख पाये। और वो चादर बेटे के लिए थी मेरे लिए नहीं। इसलिए चुपचाप ठंड सहते रहने में ही भलाई थी।  दूसरा रात होने की वजह से रेल के पहियों और पटरियों से होने वाली आवाजे कुछ ज्यादा ही तेज आ रही थी। जिससे दुर्घटना जैसे वाहियात ख्याल दिमाग में आने लगे और डर लगने लगा की कही हमारी रेल भी पटरी से उतर गयी तो ? बेवजह दिमाग कहा से कहा पहुंच जाता है। ध्यान उन बातों से हटाने की कोशिश करता पर जैसे ही आवाज आती फिर उलटे-सीधे विचार दिमाग में छट से आकर खेलने लग जाते। सोचते-सोचते जैसे ही पटरी बदलने की घड़-घड़ की तेज आवाजे आती वैसे ही लगता गयी-गयी-गयी ट्रेन गयी-गयी....। घर आकर अपना ये किस्सा मैंने सबको बताया। सब बहुत हँसे। बच्चे, बड़े सब हसते-हसते लोट-पोट हो गए। यहाँ तो सबको हँसी आ रही है पर उस समय मुझे कैसा लग रहा था ये तो मैं ही जनता हूँ। सर्दी और भय की जुगलबंदी ने मुझे सोने ना दिया। मोबाइल में फेसबुक चलाकर टाइम पास करता रहा। आस पास की सीटो पर सभी कोलकाता के थे और सब एक ही परिवार या जानकार रहे होंगे। 


अम्बाला पहुँचते-पहुँचते दिन निकल आया। नीतू के नीचे वाली सीट खाली हो गयी थी इसलिए अपनी सीट समेट वो खिड़की के पास बैठ गयी। थोड़ी देर बाद मैं भी वही जा बैठा। कोलकाता वाले सभी लोग हमसे भी ज्यादा उत्सुक लग रहे थे। ये सब भी शिमला ही जा रहे थे। और सुबह होते ही फटाफट हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदलने लगे। उन्हें लगा बस 2-3 स्टेशन और है बीच में, अब पहुँचे कालका। वो सब लाट साहब बन अपनी सीटो पर पालथी लगा बैठ गए। टॉय ट्रेन में फोटो अच्छे आने चाहिए इसके लिए उन्हें लाट साहब तो बनना ही था। मैंने ये सब नीतू को दिखाया और बोला "इसे कहते है उतावलापन" क्योंकि मुझे पता था कि ट्रेन इतनी जल्दी तो कालका पहुँचने वाली नहीं है। इसलिए हम आराम से बैठे रहे। यूँ तो ट्रेन को यहाँ से सीधा चंडीगढ़ रुकना था पर और ट्रेनों को निकालने के चक्कर में ये दूसरे छोटे स्टेशनों पर भी रूककर चलने लगी। नतीजन यह और लेट हो गयी। लुढकते हुए आखिरकार चंडीगढ़ भी आ गया और फिर चंडी देवी स्टेशन। चंडी देवी स्टेशन देख मन खिल उठा। इतना साफ सुथरा स्टेशन मैंने शायद ही कही देखा हो। मन तो था की ट्रेन को यहाँ 10 मिनट रूकना चाहिए ताकि यहाँ मैं थोड़ी चहलक़दमी कर सकु। पर मेरे सोचने भर से तो ये होने से रहा। चंडी मंदिर स्टेशन समुद्र तल से लगभग 354 मीटर (1160 फुट) की उचाई पर स्थित है और इस तरह 10:30 बजे (लेट नहीं बहुत लेट) हम कालका पहुँचे। 


एक नई सुबह एक खुबसूरत फोटो के साथ 











कितनी सफाई है चण्डी मंदिर स्टेशन पर 



चण्डी मंदिर स्टेशन

इसको कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते है ?




तारों का जंजाल यहाँ भी कुछ कम नहीं है। 





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शिमला यात्रा के सभी भाग (आप यहाँ से भी शिमला यात्रा के सभी भाग पढ़ सकते है।) -

1. अबकी बार शिमला यार- Abki Baar Shimla Yaar
2. लो आखिर आ ही गयी ट्रेन- Lo Aakhir Aa Hi Gayi Train
3.कालका-शिमला टॉय ट्रेन का सफर- Kalka-Shimla Toy Train Ka   Safar
4. जाखू मंदिर, शिमला- Jakhu Mandir, Shimla 
5. मैं और हसीन वादियां शिमला की - Main Or Haseen Vadhiyan Shimla Ki
6. यात्रा का दूसरा पहलू - Yatra Ka Dusra Pahalu 
7. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला - Indian Institute Of Advanced Study, Shimla
8. हिमाचल राज्य संग्रहालय, शिमला - Himachal State Museum, Shimla

4 comments:

  1. choti-choti baato ko bahut hi ache se humare samksh rakha hai apne ..khaskar vo neend na aane wala kissa

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    1. yahan aane ke liye shukriya satendar ji

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  2. Bahut hi acha vivran kiya aapne gaurav jee, maza aa gaya padhkar aur ek bar jo train late ho jati hai aur jyada hi late hoti chali jati hai, chaliye der se hi sahi aap shimla pahuch to gaye, toy train ka safar maine bhe kiya par pathankot se jwaladevi jate hue aur baijnath se pathankot aate hue

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    1. हौसला अफजाई के लिए आभार आपका ...

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