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Monday, 24 April 2017

जाखू मंदिर, शिमला - Jakhu Mandir, Shimla

दिनाँक- 10 मार्च 2017 , दिन- शुक्रवार

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अगले दिन सुबह 06:30 बजे नींद खुल गयी। पर्दा हटा खिड़की से बाहर का मौसम देखा तो पाया की रात को बर्फ गिरी थी जो अब पेड़ो और अन्य जगहों पर साफ़ दिखाई दे रही थी। एक-दो फोटो यही से लिए गए। कम्बल छोड़ते ही ठंड लगने लगी। मन में ख्याल आया कि इतनी सर्दी में नहाकर मरना नहीं। नहाने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है.....। फिर किसी और दिन नहा लूंगा.....। यही ठंड में बड़बड़ाते हुए ब्रश करने चला गया। लेकिन पानी देख मूंड नहाने का हो गया। पानी बहुत गर्म था और जितना मर्ज़ी उतना इस्तेमाल कर सकते थे। बिना देरी किये नहा लिया और जो ठंड थी अब तक वो भी नहाते ही गायब हो गयी। गर्म पानी में नहाने से शरीर के अंदर तक गर्मी पहुँच गयी जिससे सर्दी लगनी कुछ देर के लिए बंद हो गयी। एक-एक कर सभी तैयार हो गए। 

Monday, 10 April 2017

कालका-शिमला टॉय ट्रेन का सफर- Kalka-Shimla Toy Train Ka Safar



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दिनाँक - 09 मार्च 2017 , दिन-गुरुवार 

हम 10:30 बजे कालका स्टेशन पर उतरे। शिमला जाने वाली ट्रेन चलने को तैयार थी। यह हमारे ही वहाँ पहुँचने का इंतजार कर रही थी। सभी कोच के गेट पर टी.टी. कम देशी आदमी खड़े थे। जो फटा-फट सभी के टिकट चेक कर रहे थे। देशी इसलिए क्योंकि इन्होंने वर्दी नहीं पहन रखी थी। ये हमारी-तुम्हारी तरह जीन्स-शर्ट में थे। वो जल्द से जल्द इसको कालका से रवाना करना चाहते थे। क्योंकि यह हावड़ा ट्रेन की वजह से पहले ही 5 घंटे लेट हो चुकी थी। वे इसे और लेट नहीं करना चाहते थे। यहाँ एक ट्रेन लेट होने का मतलब है कि उसके पीछे से चलने वाली सभी ट्रेन लेट होना। और जितनी भी टॉय ट्रेन कालका से शिमला जाती है वही सब शाम को वापस शिमला से कालका आती भी है। इसलिए एक ट्रेन लेट हो गयी तो उस दिन की फिर सभी ट्रेने लेट होनी तय है। 

Monday, 3 April 2017

लो आखिर आ ही गयी ट्रेन- Lo Aakhir Aa Hi Gayi Train



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ट्रेन प्लेटफार्म पर आने से कुछ सेकंड पहले नीतू स्टेशन पर लगी एल.इ.डी. को बड़े ध्यान देख रही थी। जिस पर ये दर्शाया जा रहा था कि कौन सा डिब्बा कहाँ पर आएगा।  
"हमारा स्लीपर डिब्बा वहां आगे आएगा और हम यहाँ इतने पीछे क्यों खड़े है।" नीतू ने मुझसे कहाँ। 
जिसको मेरे द्वारा डाउनलोड किये एप पर भरोसा नहीं उसको रेलवे द्वारा लगायी गयी एल.इ.डी. पर इतना विश्वास देख मैं हैरान था। मैंने बोला "यह रेल है मेट्रो नहीं " जो ये एल.इ.डी. हमे सटीक जानकारी देंगे। हमारा डिब्बा पीछे ही आएगा। और हुआ भी वही जहां हम बैठे थे उसी के पास ही हमारा डिब्बा था। बस फिर क्या था फटाफट ट्रेन में चढ़ गए। 

Thursday, 23 March 2017

अबकी बार शिमला यार -Abki Baar Shimla Yaar



 दिनाँक- 08 मार्च 2017 ,  दिन- बुधवार 


अपनी शिमला यात्रा के बारे में आपको पहले ही अवगत करा चुका हूँ। शिमला का बहुत नाम सुना था और यह पर्यटकों के बीच बहुत ही लोकप्रिय है। इसलिए इसकी पहचान ने हमे भी अपनी ओर आकर्षित कर ही लिया। इच्छा थी कि शिमला बस से ना जाकर रेल से जाया जाये। गाज़ियाबाद से कालका हावड़ा-दिल्ली-कालका मेल और फिर कालका से शिमला के बीच चलने वाली टॉय ट्रेन में सफ़र करने पर विचार हुआ। यानी घर से शिमला तक का पूरा सफ़र सिर्फ रेल से। और वैसे भी कालका-शिमला के बीच चलने वाली रेल के बारे में मैंने भी बहुत सुना था।

Monday, 27 February 2017

मेरी आगामी यात्रा



अपनी इस पोस्ट में मैं किसी यात्रा वृतांत का जिक्र नहीं कर रहा। पिछले कुछ दिनों से मेरे घूमने पर मानो ग्रहण सा लग गया। इन दिनों कही पर भी जाना नहीं हो पाया। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि दिमाग में रह-रहकर घूमने वाला कीड़ा शांत बैठा है। वो तो निरंतर अपनी ओर से प्रयास किये जा रहा है कही घूम आने के लिए। पर मैं ही शांति बनाये हुए हूँ। उसका भी एक कारण है। 

Monday, 20 February 2017

कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां चिड़ियाघर के बारे में


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चिड़िया घर घूम तो लिए और वहाँ उपस्थित लगभग सभी जानवरों और पक्षियों से भी रूबरू होने का पूरा मौका और समय हमे मिला। अब कुछ जानकारियां यहाँ के बारे में भी लिखना ज़रूरी है। आइये शुरुआत करते है -

Sunday, 12 February 2017

चिड़ियाघर, दिल्ली (भाग-2)

22 जनवरी 2017, दिन- रविवार  (शेष भाग )


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अब घूमते-घूमते थकान महसूस होने लगी थी। वैसे तो यहाँ घूमने के लिए बैटरी से चलने वाले वाहन भी थे। जिसमे बैठकर पूरे चिड़ियाघर पर नज़र दौड़ाई जा सकती थी बिना थके। लेकिन मैं इसके पक्ष में नहीं था। हम यहाँ घूमने को आये है और ना तो हमारी स्थिति पतझड़ के उस पेड़ के सामान है जिस पर अब कुछ ही पत्ते बचे हो। और ना ही उस लाट साहब की तरह जिसने आज तक अपनी कोमल काया को रास्तों, हवा, धुप, बरसात के समक्ष रखकर अपने आस-पास फैली खूबसूरती को पहचानने उससे दोस्ती करने उसकी तक़लिफों को समझने उससे रूबरू होने की कभी कोशिश तक ना की हो। मैंने तो हमेशा प्रकृति को तवज्जो दी है उसके लिए फिर चाहे कितना भी चलना पड़े कितनी भी थकान हो वो सब मेरे लिए मायने नहीं रखता। हालांकि जीता जागता मानव होने के कारण इन सब चीज़ों से मुझे भी परेशानी ज़रूर हो रही थी पर इन जीवों को देखने की मेरी लालसा ने थकान को मुझ पर हावी नहीं होने दिया। वैसे भी ऐसी जगह वाहन से घूमने क्या मजा। एक चक्कर इस रोड पर लगा एक चक्कर दूसरी पर.....फिर तीसरी ...... फिर 1-2 घंटे में यहाँ सब देखकर बाहर का रास्ता ढूंढने लग जाओ। ये भी कोई घूमना हुआ। इससे अच्छा तो घर से ना ही निकलते तो वो ही मेरे लिए ज्यादा राहत देने वाला मलहम होता। 

Monday, 6 February 2017

चिड़ियाघर, दिल्ली (भाग-1)

22 जनवरी 2017, दिन- रविवार  


योजना 

पिछले कुछ दिनों से सर्दी अच्छी ख़ासी थी। इसी वजह से कही घूमने जाना भी नहीं हो पाया। पर एक मुसाफ़िर के कदम भला कब तक रुक पाते। घुम्मकड़ लोग ज्यादा दिन तक घर में नहीं रह पाते। जैसे ही कुछ दिन गुजरते है वैसे ही कही घूमने की ललक शुरू हो जाती है। और जो अव्वल नंबर के घुम्मकड़ है, वे लोग इस बात को बहुत ही अच्छे से जानते है। सभी घुम्मकड़ लोगो के गुण लगभग मिलते-जुलते होते है जैसे- बीमार होने पर भी ऑफिस से छुट्टी ना लेना। क्योंकि बीमारी में छुट्टी लेंगे तो फिर घूमने के नाम की छुट्टी कहा मिल पायेंगी ? इसलिए कुछ भी ज़रूरी काम हो या बीमारी, छुट्टी लेंगे तो सिर्फ घूमने के लिए। और मैं भी इन्ही में से एक हूँ। दरअसल ऊपर दिए कुछ शब्दों में मैंने अपना हाल ए दिल ही आपको बताया है। 

Saturday, 28 January 2017

सिटी फारेस्ट-ग़ाज़ियाबाद

04 दिसम्बर 2016 (दिन- रविवार) 


आज के दिन, घूमने का ना कोई मन था ना कोई पहले से बनाई हुई योजना। मैंने एक हेल्थ इन्सोरेन्स कराया था। जिसके लिए मुझे सुबह पत्नी और बेटे के साथ मेडिकल टेस्ट कराने को जाना था। जिसकी मैंने डॉक्टर से पहले ही अपॉइंटमेंट ले रखी थी। उम्मीद थी कि कम से कम 3 घंटे तो ख़राब हो ही जायेगे और घर से इंदिरापुरम जाना और आना, यह समय अलग से लगेगा। यानी आधा दिन आज इसी काम की भेंट चढ़ने वाला था। इसलिए ही मैंने कहीँ और जाने के बारे में सोचा भी नहीं।

Thursday, 19 January 2017

यात्रा चम्बा और ऋषिकेश की


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10 अक्टूबर 2016 

धनोल्टी से चम्बा लगभग 30 किलोमीटर दूर है। और अभी 1 घंटे का सफर ओर बाकी था। पहाड़ो पर सिर्फ 25-30 तक की रफ़्तार से ही आप वाहन चला सकते है। क्योकि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर घुमावदार मोड़ आते रहते है जो वाहन की रफ़्तार पर ब्रेक लगाने को मजबूर कर देते है। और मोड़ पर मुड़ने पर जैसे ही दोबारा रेस देते है, इतने में अगला मोड़ आ जाता है। इसलिए यहाँ पर किसी भी वाहन की औसत स्पीड 25-30 किलोमीटर प्रति घंटा ही रहती है। इस बीच भी हमने कई जगह बाइक रोकी। अभी सूरज ढलने में कुछ समय था लेकिन तापमान में थोड़ी गिरावट जरूर महसूस हो रही थी। और हवा दिन के मुकाबले ठण्डी होने लगी। इस बार हमने ज्यादा देर नहीं की और समय से ही चम्बा पहुँच गए।